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नाबालिग से यौन उत्पीड़न के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने बरकरार रखी सजा

10 अगस्त को दिए गए एक फैसले में, जस्टिस चंद्रशेखरण सुधा ने ट्रायल कोर्ट के अगस्त 2025 के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें उसे आईपीसी की धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध) और पॉक्सो (POCSO) एक्ट की धारा 6 (गंभीर प्रवेशक यौन उत्पीड़न के लिए सजा) के तहत दोषी ठहराया गया था।
10 अगस्त को दिए गए एक फैसले में, जस्टिस चंद्रशेखरण सुधा ने ट्रायल कोर्ट के अगस्त 2025 के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें उसे आईपीसी की धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध) और पॉक्सो (POCSO) एक्ट की धारा 6 (गंभीर प्रवेशक यौन उत्पीड़न के लिए सजा) के तहत दोषी ठहराया गया था। Photo via The Hindu

दिल्ली हाईकोर्ट ने 10 अगस्त को 2016 में 11 साल के एक बेघर लड़के के यौन उत्पीड़न के आरोपी व्यक्ति की दोषसिद्धी को बरकरार रखा। अदालत ने उन दर्लीकों को खारिज कर दिया जिनमें कहा गया था कि घटना के बारे में पीड़ित के बयानों और उसकी उम्र को लेकर अंतर्विरोधों के कारण उसकी गवाही भरोसेमंद नहीं है। जस्टिस चंद्रशेखरण सुधा ने 15 अगस्त 2026 को जारी एक फैसले में ट्रायल कोर्ट के उस फैसले पर मुहर लगाई, जिसके तहत अगस्त 2025 में आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध) और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम की धारा 6 (गंभीर प्रवेशक यौन उत्पीड़न के लिए सजा) के तहत दोषी ठहराया गया था। हालांकि, अदालत ने सजा को 20 साल से घटाकर 10 साल कर दिया। अदालत ने हवाला दिया कि पॉक्सो के तहत बढ़ाई गई सजा — जो 16 अगस्त 2019 से प्रभावी हुई — उसे 2016 के अपराध पर पिछली तारीख से लागू (रेट्रोएक्टिव) नहीं किया जा सकता (The Hindu)।

यह मामला नवंबर 2016 की एक घटना से जुड़ा है, जब दिल्ली के कश्मीरी गेट पर एक रेलवे ब्रिज के नीचे सो रहे नाबालिग ने आरोप लगाया कि आरोपी ने उसके साथ उत्पीड़न किया था। उस इलाके में मुफ्त मेडिकल सहायता कार्यक्रम चला रहे सोशल वर्कर ने लड़के द्वारा उत्पीड़न की बात बताए जाने के बाद पुलिस को इसकी सूचना दी थी। अपील के दौरान आरोपी के वकील ने दलील दी कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि घटना के समय लड़का 12 साल से कम उम्र का था, और उन्होंने उसकी गवाही में विसंगतियों का हवाला दिया, जिसमें घटना के समय उसने जो कपड़े पहने थे उसका उसका विवरण भी शामिल था। हालांकि, अदालत ने इन दावों को खारिज कर दिया और कहा कि पीड़ित की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि को देखते हुए उसकी उम्र या घटना के बारे में सटीक विवरण देने में असमर्थ होना “अस्वाभाविक” नहीं है। स्कूल के रिकॉर्ड से उसकी जन्म तिथि 12 अक्टूबर 2005 होने की पुष्टि हुई, जिससे यह साबित हुआ कि हमले के समय वह 11 साल का था (The Hindu)।

हाईकोर्ट ने बचाव पक्ष के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि नाबालिग के शरीर पर बाहरी चोटों के न होने से उसकी विश्वसनीयता कमजोर होती है। फैसले में इस बात पर जोर दिया गया कि शारीरिक सबूतों के अभाव में भी पीड़ित की गवाही “संगत और भरोसेमंद” थी, और इस तरह की कमियों से अपराध झूठा साबित नहीं होता। अदालत ने यह भी गौर किया कि आरोपी यह बताने में विफल रहा कि उसे झूठा क्यों फंसाया गया, जिससे दोषसिद्धी को पलटने का कोई आधार नहीं बचता (The Hindu)।

यह फैसला भारत में बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों को नियंत्रित करने वाले कानूनी ढांचे, विशेष रूप से पॉक्सो एक्ट और भारतीय दंड संहिता के बीच तालमेल को उजागर करता है। जहां ट्रायल कोर्ट ने संशोधित पॉक्सो एक्ट के तहत 20 साल की सजा सुनाई थी, जिसके तहत गंभीर प्रवेशक यौन उत्पीड़न के लिए कम से कम 20 साल की सजा अनिवार्य है, वहीं हाईकोर्ट ने नोट किया कि कानून को पिछली तारीख से लागू नहीं किया जा सकता। 2016 में अपराध के समय, पॉक्सो की धारा 6 के तहत अधिकतम सजा 10 साल थी, जिसके चलते सजा में कमी की गई (The Hindu)।

यह फैसला संवेदनशील गवाहों, विशेष रूप से बेघर बच्चों से जुड़े यौन उत्पीड़न के मामलों की सुनवाई में आने वाली चुनौतियों और न्याय की जरूरत के साथ कानूनी तकनीकी बारीकियों को संतुलित करने के न्यायपालिका के दृष्टिकोण को रेखांकित करता है। अदालत के आदेश में किसी अन्य अपील या लंबित कार्रवाई का उल्लेख नहीं किया गया है।

उल्लिखित स्रोत

The Hindu