पटना हाईकोर्ट ने RTI की सेकंड अपीलों के लिए 45 दिन की समयसीमा तय की
कल पटना हाईकोर्ट ने राइट टू इन्फॉर्मेशन एक्ट के तहत सेकंड अपीलों के निपटारे के लिए 45 दिन का समय तय किया।
आरटीआई (RTI) एक्ट के तहत सेकंड अपीलों का 45 दिन के भीतर निपटारा करने का पटना हाईकोर्ट का आज का निर्देश भारत के ट्रांसपेरेंसी फ्रेमवर्क में देरी से निपटने के लगातार प्रयासों को रेखांकित करता है। साल 2005 में लागू हुआ आरटीआई एक्ट नागरिकों को पब्लिक अथॉरिटीज से जानकारी मांगने का अधिकार देता है, लेकिन प्रक्रियागत बैकलॉग, खासकर अपीलीय स्तर पर, लंबे समय से इसकी प्रभावशीलता में बाधा बनता रहा है। इस आदेश का उद्देश्य सेकंड अपीलों—जो आमतौर पर शुरुआती खारिज होने के बाद दायर की जाती हैं—के समाधान को आसान बनाना है, ताकि समय पर जानकारी मिल सके। यह हाल के वर्षों में जवाबदेही तंत्र को मजबूत करने के लिए व्यापक न्यायिक और प्रशासनिक कोशिशों को झलकाता है।
पटना हाईकोर्ट ने कल बिहार के सभी अधिकारियों को राइट टू इन्फॉर्मेशन (RTI) एक्ट के तहत सेकंड अपीलों का निपटारा 45 दिन के भीतर करने का निर्देश दिया, ताकि ऐसे मामलों को सुलझाने में होने वाली लंबी देरी को दूर किया जा सके। The Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, रविवार को जारी इस आदेश में कहा गया है कि अपीलीय अधिकारियों को इन अपीलों को प्राथमिकता देनी चाहिए ताकि नागरिकों को समय पर जानकारी मिल सके।
आरटीआई एक्ट के तहत सेकंड अपीलें आमतौर पर तब दायर की जाती हैं जब कोई आवेदक किसी पब्लिक अथॉरिटी के जवाब—या जवाब न मिलने—को चुनौती देता है। हालांकि कानून में यह तय है कि ऐसी अपीलों का तुरंत समाधान किया जाए, लेकिन प्रक्रियागत अड़चनों और प्रशासनिक सुस्ती के कारण अक्सर महीनों या साल भर की देरी हो जाती है। कोर्ट के निर्देश का उद्देश्य सख्त समयसीमा लागू करना है, जो भारत के ट्रांसपेरेंसी फ्रेमवर्क में कार्यकुशलता की जरूरत पर जोर देता है।
2005 में लागू हुआ आरटीआई एक्ट नागरिकों को सरकारी निकायों से जानकारी मांगने का अधिकार देता है, जिससे जवाबदेही बढ़ती है और पब्लिक प्रशासन में पारदर्शिता आती है। हालांकि, सिस्टम की सुस्ती, खासकर अपीलीय स्तर पर, इसकी प्रभावशीलता में बाधा बनी है। पटना हाईकोर्ट का आदेश इन मुद्दों को सुलझाने के लिए बढ़ते न्यायिक जोर को दर्शाता है, जो कानून के बेहतर इस्तेमाल के लिए व्यापक प्रयासों के अनुरूप है। हाल के वर्षों में, फैसलों में तेजी लाने और बैकलॉग को कम करने के लिए अन्य हाईकोर्ट्स और सेंट्रल इंफॉर्मेशन कमीशन द्वारा भी ऐसे ही कदम उठाए गए हैं।
45 दिन की यह डेडलाइन पेंडिंग या इस आदेश के जारी होने के बाद दायर की जाने वाली सभी सेकंड अपीलों पर लागू होगी। अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे ऐसे मामलों को प्रायोरिटी मैटर के रूप में लें, ताकि प्रक्रियागत जरूरतें समय पर निपटारे में रुकावट न बनें। हालांकि यह निर्देश खास तौर पर बिहार के लिए है, लेकिन यह एक ऐसा उदाहरण पेश करता है जो दूसरे राज्यों में भी ऐसे कदमों को प्रभावित कर सकता है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए लगातार निगरानी और रिसोर्स एलोकेशन बहुत जरूरी होगा, क्योंकि आरटीआई प्रक्रियाओं को आसान बनाने की पिछली कोशिशें कभी-कभी अपर्याप्त इन्फ्रास्ट्रक्चर या ट्रेनिंग की वजह से कमजोर पड़ गई हैं।
देरी को कम करने पर इस आदेश का क्या असर होगा, यह अभी देखना बाकी है। आरटीआई एक्ट के समर्थकों ने इस कदम का स्वागत किया है और दलील दी है कि सख्त समयसीमा से सिस्टम में जनता का भरोसा बढ़ेगा। हालांकि, स्टाफ की कमी से जूझ रहे अपीलीय अधिकारियों और अलग-अलग न्यायक्षेत्रों में नियमों के असमान पालन जैसी चुनौतियां इस निर्देश की प्रभावशीलता की परीक्षा ले सकती हैं। फिलहाल, नियमों का पालन न करने पर सजा देने के लिए किसी खास तंत्र का ऐलान नहीं किया गया है, जिससे इसके लागू होने में असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
पटना हाईकोर्ट का यह दखल पारदर्शिता के आदर्शों और प्रशासनिक क्षमता की व्यावहारिक सच्चाइयों के बीच तालमेल बिठाने के चल रहे संघर्ष को रेखांकित करता है। हालांकि 45 दिन का यह आदेश जवाबदेही की दिशा में एक कदम है, लेकिन इसकी सफलता न्यायिक, प्रशासनिक और सिविल सोसाइटी के स्टेकहोल्डर्स के बीच मिलकर किए जाने वाले प्रयासों पर निर्भर करेगी।
Indian Express