बदलती पश्चिम एशियाई राजनीति के बीच भारत के सामने रणनीति के मूल्यांकन की चुनौती

जैसे-जैसे पश्चिम एशिया में गठबंधनों और सुरक्षा ढांचों का एक पीढ़ी में एक बार होने वाला पुनर्गठन हो रहा है, इस क्षेत्र में भारत का प्रभाव कमजोर होता नजर आ रहा है। एक दशक पहले, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सऊदी अरब के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'किंग अब्दुलअजीज मेडल' से सम्मानित किया गया था, जो गहरे होते रिश्तों का प्रतीक था। आज, वह पल किसी बीती हुई बात की तरह महसूस होता है। एनालिस्ट्स का कहना है कि फीकी पड़ती पार्टनरशिप से लेकर कम होते डिप्लोमैटिक जुड़ाव तक, कई मोर्चों पर भारत का रणनीतिक प्रभाव कम हुआ है, जबकि क्षेत्रीय ताकतें बदलती भू-राजनीतिक हवाओं के बीच अपने संबंधों को फिर से तौल रही हैं (The Hindu)।
इस क्षेत्र के बदलाव की पहचान सुरक्षा ढांचों और राजनीतिक विभाजनों के नए सिरे से तैयार होने से होती है। साल 2021 में, भारत ने इजराइल, अमेरिका और यूएई के साथ मिलकर I2U2 समूह ज्वाइन किया था, जिसे संयुक्त निवेश और सहयोग के मंच के रूप में प्रचारित किया गया था। साल 2024 तक, ईरान ने रणनीतिक चाबहार पोर्ट भारत को लीज पर दे दिया था, जिससे सेंट्रल एशिया का रास्ता खुल गया। फिर भी ये मील के पत्थर लगातार मजबूत असर में नहीं बदल पाए। I2U2 फ्रेमवर्क का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाया है, जबकि पाकिस्तान में चीन समर्थित ग्वादर पोर्ट के मुकाबले चाबहार की क्षमता को कम निवेश और प्रशासनिक देरी ने कमजोर कर दिया है। इस बीच, क्षेत्रीय देश तेजी से अन्य वैश्विक ताकतों के साथ गठबंधन कर रहे हैं, जिससे भारत अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है (The Hindu)।
एक स्पष्ट भारतीय रणनीति का अभाव अब चिंता का विषय बन गया है। डिप्लोमैटिक ऑब्जर्वर इस बात पर जोर देते हैं कि नई दिल्ली की महत्वाकांक्षाओं और जमीनी अमल के बीच तालमेल की कमी है। हालांकि भारत ने ऐतिहासिक रूप से मिडिल ईस्ट के देशों के साथ रिश्तों में संतुलन बनाए रखा है—इजराइल और फिलिस्तीन, सऊदी अरब और ईरान के साथ संबंधों को संभाला है—लेकिन मौजूदा माहौल में ज्यादा सटीक प्राथमिकता तय करने की जरूरत है। यूएई, जो कभी एक अहम मध्यस्थ था, उसने पाकिस्तान और चीन के साथ अधिक गहराई से जुड़ते हुए अपनी पार्टनरशिप में विविधता लाई है। ईरान ने, चाबहार समझौते के बावजूद, रूस और तुर्किये के साथ अपने रिश्ते गहरे किए हैं, जिससे भारतीय हितों को दरकिनार किया गया है। बहुपक्षीय मंचों पर भी, पश्चिम एशियाई मुद्दों पर भारत की आवाज धीमी हुई है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा और डायस्पोरा के रिश्तों के लिहाज से अहम इस क्षेत्र में परिणाम तय करने की उसकी क्षमता पर सवाल खड़े होते हैं (The Hindu)।
भारत के लिए पश्चिम एशिया का महत्व बहुत ज्यादा है। यह क्षेत्र देश के कुल तेल आयात का 40% से अधिक हिस्सा सप्लाई करता है, करीब 80 लाख भारतीय प्रवासियों का घर है और समुद्री व्यापार मार्गों के चौराहे पर स्थित है। भारत की घटती मौजूदगी से चीन जैसे प्रतिद्वंद्वियों को प्रभाव हासिल करने का जोखिम पैदा होता है, जिसने बेल्ट एंड रोड जैसी पहलों के जरिए अपने आर्थिक और डिप्लोमैटिक दायरे को आक्रामक तरीके से बढ़ाया है। इससे क्षेत्रीय गठबंधनों में पाकिस्तान का मुकाबला करने या आतंकवाद और अस्थिरता से जुड़े सुरक्षा खतरों से निपटने की भारत की क्षमता भी जटिल हो जाती है (The Hindu)।
अभी यह स्पष्ट नहीं है कि नई दिल्ली इस रुख को पलट सकती है या नहीं। कुछ एक्सपर्ट्स का तर्क है कि आर्थिक कूटनीति, बुनियादी ढांचे के विकास और बहुपक्षीय जुड़ाव पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करने से भारत की स्थिति फिर से मजबूत हो सकती है। वहीं, अन्य लोगों का मानना है कि सीमित डिफेंस एक्सपोर्ट, ब्यूरोक्रेटिक सुस्ती और विदेश नीति की टकराती प्राथमिकताओं जैसी संरचनात्मक चुनौतियों के चलते स्थिति में तेजी से सुधार की संभावना कम है। जैसे-जैसे यह क्षेत्र एक नई व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, भारत की महत्वाकांक्षाओं और उसकी क्षमताओं के बीच का अंतर इतना गहरा कभी नहीं रहा (The Hindu)।


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