दिल्ली पुलिस ने एंटी-सीईसी प्रदर्शनों को लेकर एफआईआर दर्ज कीं

दिल्ली पुलिस ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के सिलसिले में तीन एफआईआर दर्ज की हैं, हालांकि शिकायतों में किसी भी व्यक्ति का नाम नहीं लिया गया है। यह घटनाक्रम चुनाव निकाय के खिलाफ प्रदर्शनों के बाद सामने आया है, हालांकि उपलब्ध रिपोर्टों में इन प्रदर्शनों के होने का सटीक समय और उनकी प्रकृति का विवरण नहीं दिया गया है। इन मामलों से चुनावी निकाय के आसपास मचे असंतोष पर पुलिस की औपचारिक प्रतिक्रिया का संकेत मिलता है।
दिल्ली पुलिस ने कल भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 223 के तहत वैध आदेशों की अवहेलना करने के आरोप में तीन एफआईआर दर्ज की हैं। निषेधाज्ञा लागू होने के बावजूद प्रदर्शनकारियों ने जंतर-मंतर पर इकट्ठा होने की कोशिश की थी, और इस दौरान 500 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया गया (The Hindu, Indian Express)। एफआईआर में किसी भी व्यक्ति या संगठन को आरोपी के रूप में नामजद नहीं किया गया है, हालांकि एफआईआर की सामग्री में आयोजकों और भाग लेने वाले संगठनों — जिनमें आप (AAP), वाम दल (Left parties) और कॉकरोच जनता पार्टी शामिल हैं — के विवरण दर्ज हैं (The Hindu, Indian Express)। कॉकरोच जनता पार्टी पहले ही 10 अक्टूबर को दिल्ली मार्च की घोषणा कर चुकी है, जिससे यह संकेत मिलता है कि ये प्रदर्शन किसी एक दिन की घटना न होकर एक लंबे अभियान का हिस्सा हैं (Google News India)। ये एफआईआर पुलिस के आदेशों की अवहेलना करने वाली गैरकानूनी सभाओं के लिए तय मानक प्रक्रिया के तहत दर्ज की गई हैं, न कि असहमति को कुचलने के लिए की गई कोई लक्षित कार्रवाई।
पुलिस का दावा है कि ये एफआईआर निषेधाज्ञा तोड़ने पर की जाने वाली एक सामान्य प्रक्रिया हैं, लेकिन वे इस बात को छुपा रहे हैं कि ये आदेश खुद एक वैध लोकतांत्रिक मांग को रोकने के लिए लगाए गए थे। यह मांग एक ऐसे CEC के इस्तीफे को लेकर थी जिनके दफ्तर ने चुपचाप दिल्ली में EROs को ECINET पोर्टल के जरिए बिना किसी कागजात या सुनवाई के मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाने की छूट दी है (The Hindu)। एफआईआर की सामग्री में 'आप', वाम दलों और कॉकरोच जनता पार्टी के नाम दर्ज करते हुए, अज्ञात "आयोजकों" के खिलाफ BNS की धारा 223 के तहत मामले दर्ज करना एक सोची-समझी रणनीति है — इससे गिरफ्तारी की तलवार अनिश्चित काल तक लटकी रहती है, जिससे पुलिस 10 अक्टूबर को घोषित मार्च से पहले जब चाहे तब नेताओं को निशाना बना सकती है (Google News India)। जंतर-मंतर (जो कि प्रदर्शन के लिए तय की गई जगह है) पर इकट्ठा होने की कोशिश करने पर एक ही दिन में 500 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लेना असली मंशा को उजागर करता है: यह कानून का पालन कराना नहीं, बल्कि खुद चुनाव सूची की निष्पक्षता पर सवाल उठाने वाले आंदोलन को दबाना है (Indian Express)।
आयोजक इन एफआईआर को गिरफ्तारी का डर "अनिश्चित काल तक लटकाए रखने" की एक रणनीति बता रहे हैं, जबकि वे जिस एफआईआर का हवाला दे रहे हैं, उसमें खुद 'आप', वाम दलों और कॉकरोच जनता पार्टी के नाम साफ-साफ दर्ज हैं — यानी पुलिस ने कागजों पर आयोजकों की पहचान पहले ही कर ली है और जानबूझकर उन्हें इस स्टेज पर आरोपी के तौर पर नामजद नहीं किया है (The Hindu)। यह अनिश्चितकालीन धमकी के बिल्कुल उलट है; यह बिना इस स्टेज पर व्यक्तिगत आपराधिक जवाबदेही तय किए, सिर्फ भागीदारी का दस्तावेजीकरण करने का एक सोचा-समझा फैसला है। निषेधाज्ञा इस प्रदर्शन को निशाना बनाने के लिए नहीं बनाई गई थी — ये वे स्थाई आदेश हैं जिन्हें जंतर-मंतर पर तय सीमा से ज्यादा भीड़ जुटने पर आम तौर पर लागू किया जाता है, और कल 500 से ज्यादा लोगों की हिरासत इस बात का सबूत है कि नियम तोड़ने का दायरा कितना बड़ा था, न कि यह कोई खास व्यक्तिगत दुश्मनी थी (Indian Express)। ECINET पोर्टल में किए गए बदलाव चुनाव आयोग और अदालतों के सामने विचाराधीन प्रशासनिक मामले हैं; इनसे प्रदर्शनकारियों को ज़मीन पर पुलिस के वैध निर्देशों की अवहेलना करने की छूट नहीं मिल जाती।
पुलिस इसे बिना किसी को अभियुक्त बनाए नाम दर्ज करने का "नपे-तुले" तरीके का कदम बताती है — और यही वह तरीका है जिससे विरोध की आवाज़ों को दबाने का डर पैदा किया जाता है — आयोजकों की पहचान कर ली जाती है, धमकी दर्ज कर ली जाती है, और 10 अक्टूबर का मार्च चुनिंदा कार्रवाई के साये में आगे बढ़ता है (The Hindu, Google News India)। जंतर-मंतर पर लागू निषेधाज्ञा ECINET में किए गए उन बदलावों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने के संवैधानिक अधिकार को खत्म नहीं करती, जो EROs को बिना दस्तावेजों या सुनवाई के मतदाताओं के नाम हटाने की अनुमति देते हैं (The Hindu)। तय किए गए विरोध प्रदर्शन स्थल पर जुटने की कोशिश करने पर 500 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया जाना सामान्य भीड़ नियंत्रण नहीं है; यह इस बात का संकेत है कि चुनावी सूची में हेरफेर के खिलाफ असहमति जताने पर सामूहिक हिरासत में लेकर कार्रवाई की जाएगी (Indian Express)। ये FIR, हिरासत और बिना नाम वाले आरोप एक ही पैटर्न को दर्शाते हैं: प्रशासनिक पारदर्शिता की कमी को बचाना और सार्वजनिक रूप से सवाल उठाने वालों को सजा देना।
2 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर निषेधाज्ञा की अवहेलना करने वाले प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने BNS की धारा 223 के तहत तीन FIR दर्ज कीं, और 500 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया। FIR की सामग्री में AAP, वाम दलों और कॉकरोच जनता पार्टी (Cockroach Janta Party) का जिक्र तो है, लेकिन उन्हें अभियुक्त नहीं बनाया गया है (The Hindu, Indian Express)। दोनों पक्ष इन तथ्यों पर सहमत हैं लेकिन इनके मायने को लेकर उनमें मतभेद है: पुलिस इन FIR को बिना किसी तत्काल आपराधिक दायित्व के केवल प्रदर्शन में शामिल लोगों का दस्तावेजीकरण करने का एक नपा-तुला फैसला बताती है, जबकि आयोजकों का कहना है कि यह 10 अक्टूबर को होने वाले प्रस्तावित मार्च से पहले डर पैदा करने की एक सोची-समझी रणनीति है (Google News India)। मुख्य सवाल यह है कि क्या सामूहिक हिरासत और बिना नाम वाली FIR मौजूदा आदेशों का सामान्य क्रियान्वयन है या फिर ECINET पोर्टल में किए गए उन बदलावों को चुनौती देने वाले प्रदर्शनों पर लक्षित कार्रवाई है, जो बिना दस्तावेजों या सुनवाई के मतदाता सूची से नाम हटाने की अनुमति देते हैं (The Hindu)।
Delhi Police registered three FIRs under Section 223 BNS after protesters defied prohibitory orders at Jantar Mantar on October 2, detaining over 500 people while naming AAP, Left parties, and the Cockroach Janta Party in the FIR contents but not as accused (The Hindu, Indian Express). The two sides agree on these facts but disagree on their meaning: police describe the FIRs as a calibrated decision to document participation without immediate criminal liability, while organisers call it a deliberate chilling tactic ahead of a planned October 10 march (Google News India). The load-bearing question is whether the mass detentions and unnamed FIRs constitute routine enforcement of standing orders or a targeted response to protests challenging ECINET portal changes that allow electoral roll deletions without documents or hearings (The Hindu).
Delhi Police registered at least three FIRs on October 3, 2026, related to anti-CEC protests held on October 2.
The HinduThe protests on October 2 were organized by student organisations, political parties, and civil society activists demanding the resignation of Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar.
The HinduProtesters attempted to gather at Jantar Mantar on October 2.
The HinduTwo FIRs were registered at Parliament Street police station and one at Connaught Place police station.
The HinduThe FIRs invoke Section 223 of the Bharatiya Nyaya Sanhita for alleged disobedience of an order by a public servant.
The HinduNo individual or organisation has been named as an accused in the FIRs.
The HinduDetails of organisers and participating organisations are mentioned in the contents of the FIRs.
The HinduOver 500 people were detained during the protests in Delhi on October 2.
Indian ExpressAAP and Left parties led the protest in Delhi on October 2.
Indian ExpressThe Cockroach Janta Party (CJP) targeted the CEC and announced readiness for a three-month stir.
Indian ExpressThe Cockroach Janta Party announced a march to Delhi on October 10 demanding the election chief's resignation.
Google News IndiaProtesters were referred to as 'Cockroach' protesters demanding India's election chief resign over voter list changes.
AP IndiaNew options on the Election Commission's ECINET portal allow EROs in Delhi to clear voters without documents or hearings.
The HinduThe ECINET portal changes were introduced amid allegations of centralisation of its functioning for special intensive revision of electoral rolls.
The Hindu

AP India·Google News India·Indian Express·The Hindu