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झारखंड की नर्स ने दुबई में नौकरी के जाल में फंसने का अपना अनुभव साझा किया

‘The Indian Express’ ने "She signed away her freedom for a Dubai 'job': A Jharkhand nurse's story" शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसमें झारखंड की एक नर्स के मामले की पड़ताल की गई है जिसे दुबई में नौकरी के लिए ले जाया गया था। इस लेख में उसके भर्ती होने से जुड़ी परिस्थितियों और उसके बाद उसे किन हालात का सामना करना पड़ा, इसका विवरण दिया गया है। साथ ही, विदेश में नौकरी की तलाश कर रहे मेडिकल प्रोफेशनल्स के सामने आने वाली कमज़ोरियों और भर्ती के उन तौर-तरीकों पर प्रकाश डाला गया है जो शोषण का कारण बन सकते हैं।

‘The Indian Express’ ने गुरुवार को एक रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें बताया गया कि कैसे झारखंड की एक नर्स को दुबई में नौकरी के लिए रखा गया था, लेकिन वहां पहुंचने पर उसे पता चला कि उसकी नौकरी की शर्तें वादों से बिल्कुल अलग थीं। यह कहानी उन घटनाओं के सिलसिले को दोबारा जोड़ती है जिसके कारण उस महिला ने एक ऐसा कॉन्ट्रैक्ट साइन कर लिया, जिसे बाद में उसे समझ आया कि उसकी बुनियादी आज़ादी की कीमत पर था। इसमें रिक्रूटमेंट एजेंटों की भूमिका, उससे साइन करवाए गए कागज़ात और गल्फ पहुंचने पर उसे मिले हालात का ब्योरा दिया गया है (Indian Express)।

रिपोर्ट के मुताबिक, बिचौलियों ने उस नर्स से संपर्क किया था और दुबई के इस ऑफर को एक प्रतिष्ठित नियोक्ता के यहां वैध नर्सिंग पद के रूप में पेश किया था। उसने जिन दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर किए थे, उनमें ऐसी शर्तें थीं जिन्होंने उसकी आवाजाही पर रोक लगा दी, उसके कानूनी स्टेटस को एक ही स्पॉन्सर से बांध दिया और अनुमति के बिना नौकरी या देश छोड़ने की उसकी क्षमता को सीमित कर दिया—ऐसी शर्तें जिन्होंने उसे प्रभावी रूप से उसके नियोक्ता के नियंत्रण में ला दिया। लेख में बताया गया है कि कैसे भर्ती की इस प्रक्रिया ने जानकारी के अभाव का फायदा उठाया: छोटे शहरों के कई मेडिकल प्रोफेशनल्स की तरह, उस नर्स के पास भी उस ऑफर या एजेंट की साख को स्वतंत्र रूप से वेरिफाई करने के साधन नहीं थे, और विदेश में नौकरी पक्की करने की जल्दी के चलते जांच-पड़ताल करने की गुंजाइश बहुत कम बची थी (Indian Express)।

यह रिपोर्ट उसके मामले को विदेश में नौकरी की तलाश कर रहे भारतीय हेल्थकेयर वर्कर्स को प्रभावित करने वाले एक व्यापक पैटर्न के दायरे में रखती है। झारखंड, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों की नर्सें लंबे समय से गल्फ के अस्पतालों के लिए मुख्य स्रोत रही हैं, और मांग और पूर्ति को पूरा करने के लिए लाइसेंस प्राप्त और गैर-लाइसेंस प्राप्त एजेंटों का एक नेटवर्क काम करता है। हालांकि विदेश मंत्रालय और प्रोटेक्टर जनरल ऑफ एमिग्रेंट्स कुछ खास कैटेगरीज के वर्कर्स के लिए इमिग्रेशन क्लीयरेंस फ्रेमवर्क बनाए रखते हैं, लेकिन नर्सें अक्सर रेगुलेटरी ग्रे जोन में आ जाती हैं—खास तौर पर तब जब उन्हें विजिट वीज़ा पर या फ्री-ज़ोन संस्थाओं के ज़रिए रिक्रूट किया जाता है जो मानक लेबर प्रोटेक्शन को दरकिनार करती हैं। कहानी में यह बात नोट की गई है कि नर्स के कॉन्ट्रैक्ट में eMigrate सिस्टम के तहत अनिवार्य सुरक्षा उपाय नहीं थे, और यह भी कि पहुंचने पर उसके स्पॉन्सर द्वारा उसका पासपोर्ट रख लिया गया, जो यूएई के लेबर कानून के तहत प्रतिबंधित है लेकिन जिसकी खबरें अभी भी व्यापक रूप से आती हैं (Indian Express)।

गल्फ में भारतीय मिशनों ने समय-समय पर एडवाइजरी जारी कर नर्सों को ऐसे ऑफर्स स्वीकार करने के खिलाफ चेतावनी दी है जिनमें प्लेसमेंट फीस देने, पासपोर्ट जमा करने या अनिश्चितकालीन सर्विस बॉन्ड साइन करने की मांग की जाती है। फिर भी शिकायतों का सिलसिला—वेतन न मिलने से लेकर शारीरिक रूप से बंधक बनाए जाने तक—यह बताता है कि नियमों का पालन करवाना अभी भी असमान बना हुआ है। ‘The Indian Express’ की रिपोर्ट में रिक्रूटमेंट एजेंसी या दुबई के नियोक्ता का नाम उजागर नहीं किया गया है, और यह स्पष्ट नहीं है कि नर्स ने न्याय पाने के लिए दुबई में भारतीय कंसुलेट या स्थानीय police से संपर्क किया है या नहीं। लेख का अंत नर्स के अपने इस आकलन के साथ होता है कि उसने "अपनी आज़ादी को दांव पर लगा दिया था," एक ऐसा वाक्य जो पेशेवर तरक्की के वादे और कॉन्ट्रैक्ट के तहत गुलामी की उस सच्चाई के बीच के अंतर को बयां करता है जो प्रवासी कामगारों को खुलेआम अपनी गिरफ्त में ले रही है (Indian Express)।

उल्लिखित स्रोत

Indian Express