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कश्मीर में जमीन के मालिकाना हक को लेकर विवाद सामने आया

The Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, कश्मीर में जमीन के विवाद का एक ऐसा मामला सामने आया है, जहां एक प्रॉपर्टी के मालिक को इसे खरीदने के छह साल बाद पता चला कि उस जमीन पर किसी अन्य पक्ष ने मकान बनाना शुरू कर दिया है। यह मामला इस इलाके में जमीन के रिकॉर्ड और प्रॉपर्टी के अधिकारों से जुड़ी उन समस्याओं को उजागर करता है, जिनके कारण लेनदेन पूरा होने के बहुत बाद भी खरीदार आपसी दावों और दस्तावेजों में देरी के चलते अतिक्रमण का शिकार हो जाते हैं।

आज प्रकाशित The Indian Express की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कश्मीर में एक प्रॉपर्टी के मालिक को पता चला कि छह साल पहले उसके द्वारा खरीदी गई जमीन पर एक मकान का निर्माण किया जा रहा है। यह मामला क्षेत्र की जमीन प्रशासन प्रणाली में बनी हुई उन कमजोरियों को दर्शाता है, जहां खरीदारों को लेनदेन पूरा होने के काफी समय बाद भी अतिक्रमण का सामना करना पड़ सकता है।

खरीदार, जिसकी पहचान रिपोर्ट में उजागर नहीं की गई है, ने छह साल पहले यह प्लॉट खरीदा था। यह जमीन कई सालों तक खाली पड़ी रही। हाल ही में, उसी जमीन के टुकड़े पर मालिकाना हक या अधिकार का दावा करने वाले एक अन्य पक्ष ने वहां निर्माण कार्य शुरू कर दिया। मूल खरीदार को इस बात की जानकारी तब हुई जब वहां इमारत का ढांचा बनना शुरू हो चुका था।

यह विवाद कश्मीर में जमीन के रिकॉर्ड के रखरखाव और म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) की प्रक्रिया में मौजूद सिस्टम की कमजोरियों को रेखांकित करता है। टाइटल के औपचारिक ट्रांसफर के बावजूद, राजस्व रिकॉर्ड या तो इस बदलाव को निर्णायक रूप से दिखाने में असफल रहे या फिर प्रतिद्वंद्वी दावेदारों द्वारा उन पर आपत्ति जताई गई। इस क्षेत्र के कई हिस्सों में जमीन के रिकॉर्ड अभी भी आंशिक रूप से डिजिटाइज्ड हैं, म्यूटेशन की प्रविष्टियों में देरी होती है, और रजिस्टर्ड डीड (बैनामा) की तुलना में भौतिक कब्जे को अक्सर मालिकाना हक का मजबूत सबूत माना जाता है। इससे कैडस्ट्राल डेटाबेस (भू-नुक़्शा डेटाबेस) की कमियों का फायदा उठाने वाले लोगों के लिए प्रतिकूल कब्जे के दावों या फर्जी बिक्री का मौका मिल जाता है।

स्थानीय राजस्व अधिकारियों को आमतौर पर नए टाइटलधारक को मान्यता देने के लिए म्यूटेशन — यानी सरकारी रिकॉर्ड में मालिकाना हक को अपडेट करने — की आवश्यकता होती है। हालांकि, इस प्रक्रिया में महीनों या साल लग सकते हैं, जिसके दौरान जमीन असुरक्षित रहती है। इस मामले में, खरीद और अतिक्रमण के बीच का छह साल का अंतर यह बताता है कि या तो म्यूटेशन कभी पूरा नहीं हुआ, उस पर आपत्ति दर्ज कराई गई थी, या किसी अन्य प्रतिस्पर्धी एंट्री ने उसे ओवरराइड कर दिया था।

The Indian Express की रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि मूल खरीदार ने राहत के लिए अदालतों का रुख किया है या राजस्व विभाग का। ऐसे मामलों में कानूनी उपायों में आमतौर पर निर्माण पर रोक लगाने के आवेदन के साथ-साथ डिक्लेरेशन (घोषणा) और स्थायी निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) के लिए मुकदमा दायर करना शामिल होता है। हालांकि, एक बार जब ढांचा काफी हद तक बन जाता है, तो अदालतें अक्सर गिराए जाने का आदेश देने से हिचकिचाती हैं, जिससे मूल मालिक के पास केवल मुआवजे का ही विकल्प बचता है।

यह घटना जम्मू और कश्मीर में एक व्यापक पैटर्न को दर्शाती है, जहां सिविल मुकदमों में जमीन से जुड़े विवादों का हिस्सा काफी बड़ा है। साल 2019 में अनुच्छेद 370 के हटने से यह क्षेत्र गैर-निवासी खरीदारों के लिए भी खुल गया है, लेकिन इसके मुकाबले जमीनी रिकॉर्ड रखने का बुनियादी ढांचा उस रफ्तार से विकसित नहीं हुआ है। सरकार ने Digital India Land Records Modernisation Programme के तहत डिजिटाइजेशन अभियान शुरू किए हैं, फिर भी कवरेज अभी भी असमान है, खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में जहां यह विवाद होने की संभावना है।

आज की स्थिति के अनुसार, यह स्पष्ट नहीं है कि निर्माण कार्य रोका गया है या नहीं, दूसरा पक्ष कौन है, या मूल खरीदार आगे क्या कदम उठाने का इरादा रखता है। यह मामला एक चेतावनी भरे उदाहरण के रूप में सामने आया है कि कैसे समय पर म्यूटेशन और जमीनी निगरानी के बिना, औपचारिक मालिकाना हक जमीन पर बेअसर साबित हो सकता है।

स्रोतों: Indian Express

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Indian Express