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वंदे मातरम विवाद के राजनीतिक प्रभाव का आकलन

रविवार को द इंडियन एक्सप्रेस ने एक विश्लेषण प्रकाशित किया जिसमें यह सवाल उठाया गया कि क्या मध्य प्रदेश के स्कूलों में वंदे मातरम के गायन को लेकर चल रहा मौजूदा विवाद कांग्रेस पार्टी के लिए एक अहम और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मोड़ साबित हो सकता है। इसमें 1986 के शाह बानो मामले की मिसाल दी गई है जिसने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी थी। Is ‘Vande Mataram’ controversy a Shah Bano moment for Congress? शीर्षक वाले इस लेख में इस बात का परीक्षण किया गया है कि कैसे सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इस मुद्दे को राष्ट्रवाद की परीक्षा के रूप में पेश किया है, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाली राज्य सरकार (The Hindu) अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के आरोपों का सामना कर रही है।

यह विवाद तब शुरू हुआ जब मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार ने स्कूल के छात्रों के लिए हर महीने के पहले सोमवार को Vande Mataram गाना अनिवार्य कर दिया। आलोचकों का तर्क है कि यह कदम व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है और अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना बनाता है। राज्य में गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रही कांग्रेस ने शुरू में इस निर्देश का विरोध किया था, लेकिन बाद में दबाव में आकर झुक गई, जिससे पार्टी के भीतर असंतोष भड़क उठा और जनता की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। द इंडियन एक्सप्रेस का कहना है कि वैचारिक सिद्धांतों और चुनावी व्यावहारिकता के बीच संतुलन बनाने की यह कशमकश, चार दशक पहले शाह बानो मामले से निपटने के कांग्रेस के तौर-तरीकों की याद दिलाती है। उस समय पार्टी ने रूढ़िवादी धड़ों को शांत करने के लिए मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया था, जिससे अंततः धर्मनिरपेक्ष (secular) मतदाता उससे दूर हो गए (The Hindu)।

इस विश्लेषण के केंद्र में ऐतिहासिक संदर्भ है। शाह बानो मामला, जिसके कारण मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित हुआ था, को व्यापक रूप से एक ऐसे मोड़ के रूप में देखा जाता है जिसने कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष (secular) साख को कमज़ोर किया और हिंदू बहुसंख्यक राज्यों में उसके पतन को तेज किया। इसी तरह, वंदे मातरम की बहस राष्ट्रवाद, पहचान और अल्पसंख्यक अधिकारों पर छिड़ी बहसों का एक मुख्य केंद्र बन गई है। लेख में इस बात पर रोशनी डाली गई है कि कैसे बीजेपी ने इस मुद्दे को एक हथियार बना लिया है, जिसके राज्य के नेता कांग्रेस पर "राष्ट्रीय गौरव को ठेस पहुँचाने" और "एक खास समुदाय की तरफदारी करने" का आरोप लगा रहे हैं, जबकि कांग्रेस के पदाधिकारी सामाजिक सद्भाव बनाए रखने के लिए अपने रुख को एक समझौते के रूप में सही ठहरा रहे हैं (The Hindu)।

इस लेख में जिन एक्सपर्ट्स का हवाला दिया गया है, वे चेतावनी देते हैं कि कांग्रेस के सतर्क रुख से उसकी वैचारिक अस्पष्टता की धारणाओं के और मज़बूत होने का जोखिम है। एक राजनीतिक विश्लेषक डॉ. आशुतोष वार्ष्णेय का कहना है कि, "वंदे मातरम जैसे प्रतीकात्मक मुद्दों पर एक स्पष्ट रुख तय करने में पार्टी की असमर्थता, बहुसंख्यकवादी राजनीति की बढ़ती लहर के साथ अपनी धर्मनिरपेक्ष (secular) विरासत में तालमेल बिठाने में उसके सामने आ रहे व्यापक संघर्ष को दर्शाती है।" लेख में कांग्रेस के अंदरूनी मेमो का भी जिक्र किया गया है, जो तेजी से ध्रुवीकृत हो रहे मतदाताओं के बीच "राष्ट्र-विरोधी" करार दिए बिना अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा करने की चुनौती को स्वीकार करते हैं (The Hindu)।

जो बात अभी अनसुलझी है, वह यह है कि क्या इस विवाद के दूरगामी चुनावी परिणाम होंगे। जहां बीजेपी ने आगामी राज्य चुनावों के मद्देनजर इस मुद्दे पर पहले ही प्रचार करना शुरू कर दिया है, वहीं कांग्रेस की प्रतिक्रिया बंटी हुई नजर आ रही है। कुछ नेता उस चीज़ के खिलाफ अधिक दृढ़ रुख अपनाने की वकालत करते हैं जिसे वे "जबरन थोपा गया राष्ट्रवाद" कहते हैं, वहीं अन्य हिंदू मतदाताओं को दूर जाने से बचाने के लिए बीजेपी के नैरेटिव के साथ समझौता करने की बात करते हैं। द इंडियन एक्सप्रेस का निष्कर्ष है कि इस तरह की बहसों से निर्णायक तरीके से निपटने में पार्टी की विफलता शाह बानो प्रकरण से हुए दीर्घकालिक नुकसान की याद दिला सकती है, हालांकि इसका पूरा असर आने वाले महीनों में ही साफ हो पाएगा (The Hindu)।

उल्लिखित स्रोत

Indian Express