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भारतीय विज्ञान को इंडस्ट्री टैक्स से फंड करने के प्रस्तावों पर सवाल

Though well-intentioned, the myopic and fallacious 'tax-this-to-fund-that' proposition, to help science in India, needs to be dispelled immediately
Though well-intentioned, the myopic and fallacious 'tax-this-to-fund-that' proposition, to help science in India, needs to be dispelled immediately

भारत में वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए अपर्याप्त फंडिंग को लेकर चिंताएं वर्षों से बनी हुई हैं। विशेषज्ञ और नीति निर्माता लगातार टिकाऊ वित्तीय समाधानों की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं। हाल ही में ऐसे प्रस्ताव सामने आए हैं जिनमें यह सुझाव दिया गया है कि सिनेमा, पर्यटन, परिधान (apparel) और इत्र जैसे "गैर-बौद्धिक" या "तुच्छ" माने जाने वाले उद्योगों पर टैक्स लगाकर संसाधनों को वैज्ञानिक प्रगति की ओर मोड़ा जा सकता है। एक प्रमुख भारतीय अनुसंधान संस्थान के एक akademik ने विशेष रूप से इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) पर टैक्स लगाने की वकालत की है। उनका अनुमान है कि इस उपाय से वैज्ञानिक कार्यों के लिए सालाना ₹15 अरब जुटाए जा सकते हैं। यह बहस प्रतिस्पर्धी आर्थिक और विकासात्मक मांगों के बीच राष्ट्रीय संसाधनों को प्राथमिकता देने को लेकर चल रही व्यापक चर्चाओं को दर्शाती है।

एक प्रमुख भारतीय अनुसंधान संस्थान के एक akademik ने हाल ही में इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) पर टैक्स लगाने का प्रस्ताव रखा है। उनका अनुमान है कि इससे वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए सालाना ₹15 अरब जुटाए जा सकते हैं। कुछ प्रेक्षकों ने इस सुझाव को "मास्टरस्ट्रोक" करार दिया है। भारतीय विज्ञान के लिए फंडिंग को लेकर चल रही एक व्यापक बहस का हिस्सा यह विचार, सिनेमा, पर्यटन और परिधान जैसे "तुच्छ" समझे जाने वाले उद्योगों के मुनाफे को वैज्ञानिक प्रगति जैसे अधिक महत्वपूर्ण कार्यों की ओर मोड़ने की बार-बार उठने वाली प्रवृत्ति को दर्शाता है।

इस तरह के सेक्टरों पर टैक्स लगाने का तर्क IPL जैसे इवेंट्स की साफ नजर आने वाली मुनाफे की क्षमता पर आधारित है, जो भारी दर्शक वर्ग और कॉर्पोरेट स्पॉन्सरशिप को आकर्षित करते हैं। समर्थकों का सुझाव है कि इन कमाई का एक छोटा सा हिस्सा भी डायवर्ट करके अनुसंधान में चल रही पुरानी फंडिंग की कमी को दूर किया जा सकता है। हालांकि, आलोचकों का तर्क है कि यह दृष्टिकोण इन उद्योगों द्वारा पोषित आर्थिक इकोसिस्टम को नजरअंदाज करता है। उदाहरण के लिए, संगठित खेल मर्चेंडाइज, खान-पान, ब्रॉडकास्टिंग और स्पोर्ट्स साइंस के क्षेत्रों में रोजगार पैदा करते हैं, जिसके ऐसे दूरगामी प्रभाव होते हैं जो स्टेडियमों और टेलीविजन स्क्रीन से कहीं आगे तक जाते हैं। लेख के लेखक ने नोट किया है कि ऐसे उद्योग कई सेक्टरों और भौगोलिक क्षेत्रों में "ट्रिकल-डाउन बेनिफिट्स" (नीचे तक लाभ पहुंचना) में योगदान देते हैं, जो इस धारणा को चुनौती देते हैं कि उनकी सफलता वैज्ञानिक प्रगति की कीमत पर मिलती है।

इस बहस के केंद्र में एक गलत धारणा है: कि धन एक सीमित दायरा है, जहां एक सेक्टर में होने वाले फायदे का मतलब दूसरे सेक्टर का नुकसान है। 20वीं सदी के भारत सहित ऐतिहासिक आर्थिक प्रयोगों ने यह प्रदर्शित किया है कि मनोरंजन या खेल जैसे क्षेत्रों में समृद्धि स्वाभाविक रूप से वैज्ञानिक आउटपुट को कमजोर नहीं करती है। लेख में देखा गया है कि जिन देशों में खेलों पर भारी खर्च होता है, वहां का वैज्ञानिक प्रदर्शन अपने आप खराब नहीं हो जाता, और इसके उलट भी यही सच है। इसके अलावा, विज्ञान खुद इन उद्योगों से अलग-थलग नहीं है; उदाहरण के लिए, फिल्म निर्माण और कपड़ा विनिर्माण, वैज्ञानिक अनुसंधान पर आधारित तकनीकी और भौतिक नवाचारों पर निर्भर करते हैं।

"गैर-बौद्धिक" उद्योगों पर टैक्स लगाने का प्रस्ताव व्यावहारिक चिंताएं भी पैदा करता है। भले ही राजस्व को विज्ञान की तरफ डायवर्ट कर दिया जाए, लेकिन इसके आवंटन के तौर-तरीके स्पष्ट नहीं हैं। क्या फंड संस्थानों के बीच समान रूप से बांटे जाएंगे, या उत्पादकता के आधार पर प्राथमिकता दी जाएगी? अनुसंधान में उत्पादकता को मापना चुनौतियों से भरा है, और नौकरशाहों या राजनेताओं द्वारा केंद्रीकृत निर्णय लेने से अक्षमता या वास्तविक जरूरतों के साथ तालमेल न बैठने का जोखिम रहता है। जैसा कि लेख में उल्लेख किया गया है, "लाखों बिखरे हुए व्यक्तिगत निर्णय" अक्सर ऊपर से थोपे गए निर्देशों (top-down mandates) की तुलना में अधिक सूक्ष्म जानकारी रखते हैं, जो राज्य द्वारा प्रबंधित पुनर्वितरण की व्यावहारिकता पर सवाल उठाते हैं।

भारत के वैज्ञानिक फंडिंग को लेकर लंबे समय से चली आ रही चिंताओं की पृष्ठभूमि में यह चर्चा सामने आई है। देश भले ही टेक्नोलॉजिकल आत्मनिर्भरता हासिल करने की कोशिश में जुटा हो, लेकिन एक्सपर्ट्स ने बार-बार रिसर्च के लिए पर्याप्त रिसोर्सेज न होने का मुद्दा उठाया है। फिर भी, लेख में सरल समाधानों से बचने की चेतावनी दी गई है और तर्क दिया गया है कि प्रॉफिट कमाने वाले वेंचर्स पर टैक्स लगाने की नैतिक अपील जटिल आर्थिक सच्चियों की अनदेखी करती है। इसमें सुझाव दिया गया है कि चुनौती ऐसे उद्योगों के ऑर्गेनिक ग्रोथ को बाधित किए बिना, जो व्यापक आर्थिक और सामाजिक विकास में योगदान करते हैं, आपसी मुकाबला करने वाली प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाने में निहित है।

जो बात अनिश्चित बनी हुई है, वह यह है कि क्या वैकल्पिक फंडिंग मॉडल—जैसे कि बढ़ा हुआ पब्लिक इन्वेस्टमेंट, प्राइवेट-सेक्टर पार्टनरशिप, या मौजूदा एलोकेशन सिस्टम में सुधार—उद्योगों को आमने-सामने लाए बिना इस कमी को पूरा कर सकते हैं। फिलहाल, यह बहस तात्कालिक वित्तीय उपायों और भारत की वैज्ञानिक महत्वाकांक्षाओं को समर्थन देने के लिए सस्टेनेबल, सोच-समझकर बनाई गई रणनीतियों की जरूरत के बीच के तनाव को उजागर करती है।

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