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गांधीजी ने स्वतंत्रता दिवस कलकत्ता में क्यों बिताया था

जैसे-जैसे भारत अपनी स्वतंत्रता के 80 वर्ष के करीब पहुंच रहा है, हम इसके पहले स्वतंत्रता दिवस को याद कर रहे हैं।
जैसे-जैसे भारत अपनी स्वतंत्रता के 80 वर्ष के करीब पहुंच रहा है, हम इसके पहले स्वतंत्रता दिवस को याद कर रहे हैं। Photo via Brut

1947 में आज ही के दिन भारत को ब्रिटिश शासन से आजादी मिली थी। यह एक ऐतिहासिक पल था जिसे पूरे देश में समारोहों और भाषणों के साथ मनाया गया था, जिसमें दिल्ली में संविधान सभा का प्रतिष्ठित मध्यरात्रि सत्र भी शामिल था। हालांकि, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सर्वोपरि नेता महात्मा गांधी राजधानी में रहने के बजाय, जहां प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और अन्य लोग थे, 15 अगस्त 1947 को कलकत्ता (अब कोलकाता) में थे।

15 अगस्त 1947 को, जब पूरा भारत दिल्ली में जश्न मनाती भीड़ के साथ अपनी आजादी का जश्न मना रहा था, तब महात्मा गांधी ने अपना दिन कलकत्ता में बिताया। उस समय वह शहर सांप्रदायिक हिंसा की चपेट में था और गांधीजी हिंदुओं और मुसलमानों के बीच शांति को बढ़ावा देने के जानबूझकर किए गए प्रयास के तहत वहां मौजूद थे। जहां प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने लाल किले पर तिरंगा फहराया और राष्ट्र को संबोधित किया, वहीं गांधीजी ने शहर में अपने अस्थायी निवास 6B जनपथ (जिसे अब हौज़ खास कहा जाता है) के एक तंग कमरे में, स्वयंसेवकों और कम्युनिटी लीडर्स से घिरे हुए इस ऐतिहासिक पल को बिताया (Indian Express)।

एक प्रमुख औद्योगिक और सांस्कृतिक केंद्र कलकत्ता, आजादी से ठीक पहले के महीनों में सांप्रदायिक संघर्ष का अड्डा बन चुका था। मुस्लिम लीग द्वारा बुलाई गई डायरेक्ट एक्शन डे की वजह से अगस्त 1946 में हुए दंगों में हजारों लोग मारे गए थे और अनगिनत लोग बेघर हो गए थे, और 1947 के दौरान भी तनाव बना रहा था। गांधीजी 27 जून 1947 को शहर पहुंचे थे और उन्होंने तब तक वहीं रहने की कसम खाई थी जब तक कि "शांति बहाल नहीं हो जाती।" आने वाले हफ्तों में, उन्होंने रोज प्रार्थना सभाएं कीं, हिंदू और मुस्लिम नेताओं से मुलाकात की, और दंगा प्रभावित इलाकों में पैदल घूमे, लोगों से आपसी मेल-मिलाप की अपील की। अगस्त के मध्य तक, उनकी मौजूदगी से तनाव कम होने लगा था, हालांकि छिटपुट हिंसा अभी भी जारी थी (Indian Express)।

स्वतंत्रता दिवस पर कलकत्ता में ही रहने का फैसला इस बात का प्रतीक था कि गांधीजी जश्न से ज्यादा एकता को अहमियत देते थे। उन्होंने शहर में आयोजित झंडा फहराने के कार्यक्रमों में हिस्सा लेने से इनकार करते हुए कहा था, "जब मेरे हिंदू और मुस्लिम भाई एक-दूसरे को मार रहे हैं, तो मैं जश्न नहीं मना सकता।" इसके बजाए, उन्होंने अपना दिन छोटी-छोटी सभाओं को संबोधित करने में बिताया, जिसमें सांप्रदायिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकजुटता की जरूरत पर जोर दिया गया। उस सुबह लिखे गए एक पत्र में उन्होंने लिखा था, "हमें जो आजादी मिली है उसका कोई मतलब नहीं है अगर हम शांति से एक साथ नहीं रह सकते" (Indian Express)।

जहां दिल्ली नई-नई मिली संप्रभुता के रंग में डूबी हुई थी, और संविधान सभा के मध्यरात्रि सत्र ने सत्ता के प्रतीकात्मक हस्तांतरण को चिह्नित किया था, वहीं राजधानी से गांधीजी की गैर-मौजूदगी ने भारत की आजादी की नाजुक हकीकत को उजागर किया। ब्रिटिश भारत को दो डोमिनियन - भारत और पाकिस्तान में बांटे जाने से बड़े पैमाने पर लोगों का विस्थापन और खून-खराबा हुआ था, और कलकत्ता नए देशों की सीमा पर एक धार पर खड़ा था। वहां गांधीजी की मौजूदगी राजनीतिक जश्न के खिलाफ एक नैतिक विरोध की तरह थी, जो सामाजिक तालमेल के लिए अधूरे संघर्ष को उजागर कर रही थी (Indian Express)।

इतिहासकारों का कहना है कि गांधीजी का कलकत्ता प्रवास, देश के बंटवारे की वजह से पैदा हुए मानवीय संकट को कम करने की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा था। अहिंसा और अंतर-धार्मिक बातचीत के लिए उनकी वकालत, भले ही दिल्ली के राजनीतिक ड्रामे के पीछे छिप गई हो, लेकिन क्षेत्र में स्थिति को संभालने में उसने एक अहम भूमिका निभाई थी। सितंबर 1947 तक, कलकत्ता में हालात कुछ हद तक सामान्य होने लगे थे, और इस बदलाव का श्रेय काफी हद तक गांधीजी के लगातार प्रयासों को जाता है। हालांकि, उनका काम अभी खत्म नहीं हुआ था; अपनी हत्या से कुछ हफ्ते पहले, दिल्ली में हिंसा को शांत करने के लिए वह जनवरी 1948 में भूख हड़ताल पर बैठने वाले थे (Indian Express)।

79 साल बाद, दिल्ली के जश्न वाले नैरेटिव और कलकत्ता में गांधी के शांत उपवास के बीच का अंतर हमें भारत की आजादी के साथ जुड़ी जटिल सच्चाइयों की याद दिलाता है। जहां पूरा देश 15 अगस्त को राजनीतिक आजादी की एक बड़ी जीत के रूप में मनाता है, वहीं जश्न की बजाय मेल-मिलाप को प्राथमिकता देने का गांधी का फैसला एक एकजुट राष्ट्र के निर्माण की अनवरत चुनौतियों की गवाही देता है।

उल्लिखित स्रोत

Indian Express