क्या हमने आपको ग्राउंडेड रखा? हमें बताएँ ↓
रिपोर्ट1 स्रोत · 1 दावा सुरक्षित · 0 सत्यापितमध्यमसंख्या 12 / 21

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस लीडरशिप में हुआ फेरबदल अखिलेश की PDA रणनीति के अनुकूल

सपा प्रमुख अखिलेश यादव, जिनकी 'PDA' रणनीति उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के हालिया लीडरशिप फेरबदल के साथ मेल खाती है।
सपा प्रमुख अखिलेश यादव, जिनकी 'PDA' रणनीति उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के हालिया लीडरशिप फेरबदल के साथ मेल खाती है। Photo via Thehindu

The Indian Express ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस लीडरशिप में हुए फेरबदल पर रिपोर्ट दी है, और इसे अखिलेश यादव के PDA दांव के अनुरूप बताया है। यह लेख उत्तर प्रदेश के चुनावी समीकरणों के संदर्भ में इस संगठनात्मक बदलाव के राजनीतिक प्रभावों का विश्लेषण करता है।

The Indian Express ने एक एनालिसिस पब्लिश किया है जिसमें तर्क दिया गया है कि कांग्रेस पार्टी द्वारा उत्तर प्रदेश की लीडरशिप में किया गया हालिया फेरबदल, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के "PDA" (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के साथ एक रणनीतिक तालमेल को दर्शाता है (Indian Express)।

यह लेख उत्तर प्रदेश में विपक्ष की राजनीति को तय करने वाले चुनावी गणित के नजरिए से कांग्रेस की स्टेट यूनिट के संगठनात्मक बदलावों का विश्लेषण करता है। इसमें कहा गया है कि नई नियुक्तियां इस बात का संदेश देने के लिए डिजाइन की गई हैं कि पार्टी उस सामाजिक गठबंधन के प्रति प्रतिबद्ध है, जिसे यादव ने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को चुनौती देने के लिए अपने केंद्र में रखा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस फेरबदल में उन खास जातियों और समुदायों के नेताओं को आगे बढ़ाया गया है जो PDA ढांचे का हिस्सा हैं। एनालिसिस में यह माना गया है कि यह महज एक आंतरिक संगठनात्मक कवायद नहीं है, बल्कि कांग्रेस के सामाजिक आधार को राज्य में उसके मुख्य सहयोगी के साथ तालमेल बिठाने का एक सोचा-समझा कदम है, ताकि भविष्य के चुनावों में टिकट बंटवारे और कैंपेन मैसेजिंग को लेकर आपसी खींचतान को कम किया जा सके।

यह लेख कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के रिश्तों के इतिहास को खंगालता है, जो पिछले एक दशक के दौरान कभी गठबंधन तो कभी प्रतिद्वंद्विता के दौर से गुजरे हैं। इसमें यह भी नोट किया गया है कि PDA नैरेटिव पर मौजूदा सहमति, राज्य में स्वतंत्र रूप से उच्च जाति या ब्राह्मण-नेतृत्व वाली छवि गढ़ने के कांग्रेस के पुराने प्रयासों से एक अलग राह को दर्शाती है। रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि नई टीम इस बात को स्वीकार करती है कि उत्तर प्रदेश में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने का रास्ता उसी सोशल जस्टिस की शब्दावली से होकर गुजरता है जिसे समाजवादी पार्टी ने अपनी पहचान बना लिया है।

यह लेख फेरबदल के आदेशों की सटीक तारीख नहीं बताता है और न ही हर एक नियुक्ति की सूची देता है, बल्कि इसके बजाय बदलावों के पीछे की संरचनात्मक सोच पर फोकस करता है। यह घटनाक्रम 2022 और 2024 के चुनावी नतीजों के जवाब के रूप में देखा गया है, जहां विपक्ष के मिले-जुले वोट शेयर ने एक एकजुट PDA ब्लॉक की क्षमता को तो दिखाया ही, साथ ही बिखरे हुए नेतृत्व के नुकसान को भी उजागर किया।

जो बात अभी भी साफ नहीं है, वह यह है कि क्या इस फेरबदल से जमीनी स्तर पर बेहतर तालमेल देखने को मिलेगा, खासकर उन इलाकों में जहां दोनों पार्टियां ऐतिहासिक रूप से एक ही वोटर वर्ग के लिए मुकाबला करती रही हैं। रिपोर्ट इस सवाल को खुला छोड़ देती है कि कांग्रेस कैसे अपनी राष्ट्रीय संगठनात्मक प्राथमिकताओं और किसी क्षेत्रीय सहयोगी के सोशल जस्टिस के ढांचे के सामने स्टेट लेवल पर खुद को ढालने के बीच संतुलन बनाएगी।

उल्लिखित स्रोत

Indian Express