भारतीय बेंचमार्क शेयरों में 25 वर्षों की सबसे लंबी साप्ताहिक गिरावट दर्ज

भारतीय बेंचमार्क शेयरों ने एक चौथाई सदी में अपनी सबसे लंबी साप्ताहिक गिरावट का रिकॉर्ड बनाया है, जो बाजार में आई एक बड़ी मंदी को दर्शाता है। यह मील का पत्थर 1990 के दशक के अंत के बाद से नहीं देखी गई बिकवाली के लंबे दौर का संकेत देता है।
रॉयटर के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय बेंचमार्क इक्विटी इंडेक्स गुरुवार को लगातार पांचवें सप्ताह गिरावट के साथ बंद हुए। यह एक चौथाई सदी में साप्ताहिक गिरावट का सबसे लंबा सिलसिला है। निफ्टी 50 और एसएंडपी बीएसई सेंसेक्स (S&P BSE Sensex) ने उस बिकवाली को आगे बढ़ाया है जो सितंबर के दौरान भी जारी रही, जिससे साल की शुरुआत में हुई बढ़त खत्म हो गई और दोनों ही इंडेक्स 2026 के लिए नकारात्मक दायरे में चले गए।
अगस्त के अंत में शुरू हुआ यह गिरावट का सिलसिला 2001 के बाद से साप्ताहिक गिरावट का सबसे लंबा दौर है। वह दौर डॉट-कॉम बबल (dot-com bubble) के टूटने और वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद का समय था। मौजूदा गिरावट के दौरान, निफ्टी 50 अपने चरम से लगभग 6% टूट चुका है, जबकि सेंसेक्स में भी इसी के बराबर गिरावट आई है। विदेशी पोर्टफोलियो से लगातार हो रहे पूंजी के बहिर्गमन (outflows) और घरेलू कमाई (earnings) की धीमी होती रफ्तार की चिंताओं ने बाजार पर दबाव बनाया है (Reuters India)।
मार्केट पार्टिसिपेंट्स ने इस गिरावट की अवधि के लिए वैश्विक और स्थानीय दोनों कारकों के मेल को जिम्मेदार ठहराया है। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड (U.S. Treasury yields) में बढ़ोतरी ने उभरते बाजारों के शेयरों के आकर्षण को कम कर दिया है, जिससे विदेशी संस्थागत निवेशकों (foreign institutional investors) द्वारा लगातार बिकवाली शुरू हो गई है। इन निवेशकों ने पिछले महीने भारतीय शेयरों से अरबों डॉलर निकाल लिए हैं। घरेलू मोर्चे पर, जून तिमाही के लिए कॉर्पोरेट नतीजों का उम्मीद से धीमा रहना और सितंबर तिमाही को लेकर मैनेजमेंट टीमों के सतर्क बयानों ने निवेशकों के जोखिम लेने की क्षमता (risk appetite) को कम किया है (Google News India)।
इस बिकवाली का दायरा काफी व्यापक रहा है, जिसमें मिड-कैप और स्मॉल-कैप इंडेक्स - जिन्हें अक्सर घरेलू रिटेल सेंटिमेंट का पैमाना माना जाता है - में भी साप्ताहिक गिरावट दर्ज की गई है, हालांकि उनकी गिरावट बड़े-कैप बेंचमार्क की तुलना में थोड़ी कम रही है। सेक्टर के हिसाब से, फाइनेंशियल और इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के शेयरों, जिनका इंडेक्स में सबसे ज्यादा वेटेज है, ने इस मंदी की अगुवाई की है। यह क्रमशः ब्याज दरों के रुख और वैश्विक मांग के दृष्टिकोण के प्रति उनकी संवेदनशीलता को दर्शाता है।
हालांकि पांच हफ्ते की यह गिरावट 2001 के सिलसिले की अवधि से मेल खाती है, लेकिन एनालिस्ट्स ने बताया कि 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट या 2020 के शुरुआती कोविड-19 झटके के दौरान देखे गए नुकसान की तुलना में यह प्रतिशत गिरावट अभी काफी कम है। बाजार का प्राइस-टू-अर्निंग्स मल्टीपल (price-to-earnings multiple) घटकर इसके लॉन्ग-टर्म औसत के करीब आ गया है, जो ऐतिहासिक रूप से वैल्यू बायर्स को आकर्षित करता है, हालांकि मंदी के दौर के थमने का समय वैश्विक तरलता (liquidity) की स्थिति और आगामी घरेलू कमाई के सीजन पर निर्भर करेगा।

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