कैसे 1952 के तमिलनाडु उपचुनाव ने भारत का पहला कॉन्फिडेंस मोशन ट्रिगर किया था
आर्काइव्स से — अरुप्पुकोट्टै लोकसभा उपचुनाव में हार के बाद मुख्यमंत्री सी. राजगोपालचारी को भारतीय विधायिका में इतिहास का पहला अविश्वास या विश्वास प्रस्ताव (vote of confidence) पेश करने के लिए मजबूर होना पड़ा था।

तमिलनाडु में एक लोकसभा उपचुनाव ने भारतीय विधायिका में पहले कॉन्फिडेंस मोशन को ट्रिगर किया, जो एक महत्वपूर्ण संवैधानिक क्षण था। उपचुनाव के नतीजे ने संभवतः एक ऐसी राजनीतिक स्थिति पैदा कर दी थी जिसके चलते सरकार को संसद के निचले सदन में अपने बहुमत का समर्थन साबित करना पड़ा। यह घटनाक्रम भारतीय संसदीय इतिहास में विधायी विश्वास की एक अभूतपूर्व परीक्षा था। उपचुनाव की खास परिस्थितियों और सरकार की संसदीय ताकत पर इसके असर ने इस ऐतिहासिक कॉन्फिडेंस मोशन को अनिवार्य बना दिया था।
फरवरी 1952 में, भारत में पहले आम चुनाव हुए थे। अप्रैल तक, सी. राजगोपालचारी ने मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले ली थी और वे एक ऐसी कांग्रेस मिनिस्ट्री का नेतृत्व कर रहे थे जिसके पास असेंबली में स्पष्ट बहुमत नहीं था। कुछ ही हफ्तों के भीतर, उनकी सरकार को एक ऐसी परीक्षा का सामना करना पड़ा जिसकी उन्होंने उम्मीद नहीं की थी: लगभग एक साथ दो लोकसभा उपचुनाव हुए। टी. ए. लिंगम चेट्टियार के निधन के बाद कोयंबटूर में एक सीट खाली हुई थी। वहीं दूसरी सीट अरुप्पुकोट्टै में, एक प्रमुख फॉरवर्ड ब्लॉक (मार्क्सिस्ट ग्रुप) लीडर यू. मुथुरामलिंगा तेवर के इस्तीफे के बाद खाली हुई थी, जिन्होंने दो सदस्यीय मुदुकुलथुर असेंबली निर्वाचन क्षेत्र से भी सीट जीती थी (The Hindu)।
उस समय अरुप्पुकोट्टै को देश का सबसे बड़ा संसदीय निर्वाचन क्षेत्र माना जाता था, जो पूर्व में रामेश्वरम से लेकर उत्तर में सात्तूर तक फैला हुआ था (The Hindu)। राजगोपालचारी ने दोनों मुकाबलों को अपनी दो महीने पुरानी मंत्रिपरिषद के खिलाफ जनमत संग्रह (referendum) के रूप में पेश करने का फैसला किया था। कोयंबटूर में, उन्होंने मतदाताओं से पूछा कि क्या वे चाहते हैं कि मिनिस्ट्री काम करती रहे या वे कम्युनिस्टों के हाथों में सत्ता सौंपना चाहते हैं। अरुप्पुकोट्टै में मतदान से कुछ दिन पहले, वे कोविलपट्टी रेलवे स्टेशन पर रुके और भीड़ से कहा कि इस चुनाव से पता चलेगा कि लोग उनकी सरकार का कितना समर्थन करते हैं (The Hindu)।
कोयंबटूर में 14 जून को मतदान हुआ था। कांग्रेस उम्मीदवार एन. एम. लिंगम ने 1,49,664 वोटों में से 92,465 वोट पाकर निर्णायक जीत हासिल की और CPI की पार्वती कृष्णन को लगभग 41,300 वोटों के अंतर से हराया (The Hindu)। नौ दिन बाद, 23 जून को, अरुप्पुकोट्टै के नतीजों ने चौंका दिया। फॉरवर्ड ब्लॉक (मार्क्सिस्ट ग्रुप) के उम्मीदवार एम. डी. रामासामी ने कांग्रेस उम्मीदवार राजथल कुंजिथपाथम को 18,835 वोटों के अंतर से हरा दिया (The Hindu)।
मुख्यमंत्री ने जिस निर्वाचन क्षेत्र में व्यक्तिगत रूप से अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगाई थी, वहां हार मिलने के बाद एक अभूतपूर्व संवैधानिक कदम उठाना पड़ा। राजगोपालचारी ने विधायिका में कॉन्फिडेंस मोशन पेश किया — ऐसा पहली बार हुआ था जब भारत में किसी मौजूदा सरकार ने ऐसा किया हो — ताकि यह साबित किया जा सके कि उपचुनाव के इस झटके से असेंबली में उसका बहुमत कम नहीं हुआ है (The Hindu)। यह प्रस्ताव पास हो गया, जिससे मिनिस्ट्री बच गई, लेकिन इस घटना ने एक ऐसा प्रक्रियागत (procedural) उदाहरण कायम किया जिसकी गूं आने वाले दशकों तक भारतीय संसदीय प्रथाओं में सुनाई देती रही।
The Hindu