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भारत ने रिन्यूएबल पावर प्रोड्यूसर्स को देरी के बाद भी ग्रिड कनेक्टिविटी बनाए रखने की अनुमति दी

भारत के पावर रेगुलेटर ने क्लीन एनर्जी डेवलपर्स को डेडलाइन चूकने के बाद फीस चुकाकर ग्रिड कनेक्टिविटी बढ़ाने की इजाजत दी है, जिससे रिन्यूएबल प्रोजेक्ट्स में होने वाली देरी से निपटा जा सके और ट्रांसमिशन नेटवर्क तक पहुंच बेहतर हो सके।
भारत के पावर रेगुलेटर ने क्लीन एनर्जी डेवलपर्स को डेडलाइन चूकने के बाद फीस चुकाकर ग्रिड कनेक्टिविटी बढ़ाने की इजाजत दी है, जिससे रिन्यूएबल प्रोजेक्ट्स में होने वाली देरी से निपटा जा सके और ट्रांसमिशन नेटवर्क तक पहुंच बेहतर हो सके। Photo via Energy

भारत अपने जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने और फॉसिल फ्यूल्स पर निर्भरता कम करने के लिए लगातार रिन्यूएबल एनर्जी को बढ़ावा दे रहा है, जिसमें सोलर और विंड प्रोजेक्ट्स उसके क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन में अहम भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि, जमीन अधिग्रहण, फाइनेंसिंग या रेगुलेटरी मंजूरियों जैसी मुश्किलों के चलते प्रोजेक्ट पूरा होने में होने वाली देरी की वजह से कई बार रिन्यूएबल पावर प्रोड्यूसर्स के सामने ग्रिड कनेक्टिविटी खोने का खतरा पैदा हो जाता है, जो

भारत ने रिन्यूएबल पावर प्रोड्यूसर्स को देरी के बाद भी ग्रिड कनेक्टिविटी बनाए रखने की अनुमति दी

आज भारत ने एक नई पॉलिसी का ऐलान किया है, जिसके तहत रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपर्स प्रोजेक्ट में देरी के बावजूद फीस चुकाकर अपना ग्रिड कनेक्शन बरकरार रख सकेंगे।

हम क्या जानते हैं

  • भारत ने रिन्यूएबल पावर प्रोड्यूसर्स को प्रोजेक्ट में देरी के बाद फीस चुकाकर ग्रिड कनेक्टिविटी बरकरार रखने की अनुमति दी है। — reuters_india, google_news_india

संदर्भ

भारत अपने जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने और फॉसिल फ्यूल्स पर निर्भरता कम करने के लिए लगातार रिन्यूएबल एनर्जी को बढ़ावा दे रहा है, जिसमें सोलर और विंड प्रोजेक्ट्स उसके क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन में अहम भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि, जमीन अधिग्रहण, फाइनेंसिंग या रेगुलेटरी मंजूरियों जैसी मुश्किलों के चलते प्रोजेक्ट पूरा होने में होने वाली देरी की वजह से कई बार रिन्यूएबल पावर प्रोड्यूसर्स के सामने ग्रिड कनेक्टिविटी खोने का खतरा पैदा हो जाता है, जो

दृष्टिकोण

आलोचकों का पक्ष (समापन): दूसरे पक्ष का तर्क है कि इस पॉलिसी से उन रिन्यूएबल प्रोजेक्ट्स को निरंतरता मिलती है जिन्हें अप्रत्याशित देरी का सामना करना पड़ रहा है, जिससे निवेशकों का भरोसा सुरक्षित रहता है। हालांकि, इससे एक ऐसी दो-स्तरीय व्यवस्था बनती है जहाँ केवल वे लोग जिनके पास अतिरिक्त पूंजी है, कनेक्टिविटी बनाए रख सकते हैं, जिससे उस समान अवसर के दायरे को नुकसान पहुंचता है जिसका उद्देश्य रिन्यूएबल एनर्जी में वास्तविक इनोवेशन और दक्षता को बढ़ावा देना है (सामान्य ज्ञान की जांच)। देरी को मौद्रिक रूप देने से सुस्ती को सामान्य बनाने का जोखिम पैदा होता है, क्योंकि फर्में बाद में मामूली फीस चुकाकर अपना कैश फ्लो बचाने के लिए जानबूझकर डेडलाइन चूक सकती हैं (आंतरिक विरोधाभास)। यह इंफ्रास्ट्रक्चर पॉलिसी के लिए एक खतरनाक मिसाल कायम करता है, जहाँ जवाबदेही की जगह ट्रांजैक्शनल अनुपालन ले लेता है।

सोर्स

सोर्सेस: Google News India, Reuters India

उल्लिखित स्रोत

Google News India·Reuters India