संसद की scrutiny के बीच केंद्र ने IITs में फैकल्टी की कमी पर दिया जवाब
कल सरकार ने संसद को बताया कि पिछले चार वर्षों में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) में 3,500 फैकल्टी पदों को भरा गया है।
सोमवार को संसद सत्र के दौरान सदस्यों ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) में फैकल्टी-छात्र अनुपात पर चिंता जताई, जिसके बाद केंद्र ने खुलासा किया कि पिछले चार वर्षों में इन संस्थानों में 3,500 फैकल्टी पदों को भरा गया है। सरकार की ओर से दिए गए इस जवाब में उन पुरानी स्टाफ की कमी को दूर करने के प्रयासों पर प्रकाश डाला गया, जिस पर शिक्षाविदों और नीति निर्माताओं की नजरें टिकी हुई हैं (Indian Express)।
IITs में फैकल्टी की भर्ती का मुद्दा बरसों से बना हुआ है। आलोचकों का तर्क है कि स्टाफ और छात्रों का अपर्याप्त अनुपात देश के इन शीर्ष तकनीकी संस्थानों में शिक्षा और रिसर्च की गुणवत्ता को कमजोर करता है। चर्चा के दौरान, सांसदों ने छात्रों की बढ़ती संख्या और विस्तार लेते एकेडमिक प्रोग्राम्स के हिसाब से फैकल्टी की नियुक्ति में लगातार निवेश करने की जरूरत पर जोर दिया। इसके जवाब में, केंद्र ने ऐसे आंकड़े पेश किए जो बताते हैं कि 3,500 नियुक्तियों से खाली पदों में काफी कमी आई है, हालांकि सरकार ने मौजूदा अनुपात का जिक्र नहीं किया और न ही इसकी तुलना राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय मानकों से की (Indian Express)।
सरकार के इन आंकड़ों से IITs में इंफ्रास्ट्रक्चर और स्टाफ को आधुनिक बनाने के लिए किए जा रहे लक्षित प्रयासों का पता चलता है। ग्लोबल स्तर पर शीर्ष इंजीनियरिंग संस्थानों में गिने जाने वाले IITs को फैकल्टी की आदर्श संख्या बनाए रखने में चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। अधिकारियों के मुताबिक, भर्ती अभियानों का फोकस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस और रिन्यूएबल एनर्जी जैसे उभरते क्षेत्रों के एक्सपर्ट्स को आकर्षित करना रहा है, जिन्हें भारत की तकनीकी तरक्की के लिए बेहद अहम माना जाता है। हालांकि, भर्ती की रफ्तार अभी भी बहस का मुद्दा बनी हुई है, क्योंकि IITs लगातार रिटायरमेंट, नौकरी छोड़ने वाले लोगों (attrition) और परमानेंट फैकल्टी की नियुक्ति से जुड़ी लंबी प्रक्रियाओं से जूझ रहे हैं (Indian Express)।
भले ही केंद्र के जवाब से इस दिशा में हुई प्रगति का पता चलता है, लेकिन इन प्रयासों की स्थिरता (sustainability) को लेकर सवाल अभी भी बने हुए हैं। कुछ एक्सपर्ट्स का तर्क है कि चार साल में 3,500 फैकल्टी सदस्यों की भर्ती - भले ही यह काफी बड़ी संख्या हो - स्टाफ की कमी से जुड़ी व्यवस्थागत समस्याओं को पूरी तरह से दूर नहीं कर सकती, जिसमें प्रशासनिक देरी (bureaucratic delays) और प्राइवेट सेक्टर में मिलने वाले आकर्षक सैलरी स्ट्रक्चर जैसी बातें शामिल हैं। इसके अलावा, मौजूदा फैकल्टी-छात्र अनुपात पर अपडेटेड डेटा न होने के कारण यह साफ नहीं हो पाया है कि इन सुधारों से संस्थागत क्षमता और छात्रों के एडमिशन के बीच का अंतर वास्तव में कम हुआ है या नहीं (Indian Express)।
फिलहाल, मिनिस्ट्री ऑफ एजुकेशन ने भर्ती की गति तेज करने या रिक्रूटमेंट पॉलिसी में बदलाव करने की किसी नई योजना का ऐलान नहीं किया है, जिससे यह आशंका बनी हुई है कि स्टाफ की कमी की चुनौती फिर से सामने आ सकती है। संसद के इस दखल से यह साफ है कि विधायिका इस बात को लेकर लगातार गंभीर है कि IITs अपनी ग्लोबल साख बनाए रखें, लेकिन उस लक्ष्य को हासिल करने का रास्ता अभी भी चर्चा के दायरे में है।
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