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द इंडियन एक्सप्रेस ने सीएम उमर के स्टेटहुड रेजोल्यूशन पर विपक्ष की समीक्षा की

जम्मू-कश्मीर विधानसभा का एक दृश्य, जहाँ स्टेटहुड रेजोल्यूशन पर चर्चा और राजनीतिक गतिशीलता सामने आती है।
जम्मू-कश्मीर विधानसभा का एक दृश्य, जहाँ स्टेटहुड रेजोल्यूशन पर चर्चा और राजनीतिक गतिशीलता सामने आती है। Photo via Newindianexpress

द इंडियन एक्सप्रेस ने एक आर्टिकल प्रकाशित किया है जिसमें जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला द्वारा स्टेटहुड की बहाली के लिए पेश किए गए रेजोल्यूशन के पीछे की राजनीतिक गतिशीलता और उन ताकतों की समीक्षा की गई है जो कथित तौर पर इसे खारिज करवाना चाहती थीं। यह लेख इस बहस को क्षेत्र के राजनीतिक खिलाड़ियों और नई दिल्ली में बैठी केंद्र सरकार के बीच मुकाबला बताता है, और अगस्त 2019 में आर्टिकल 370 के खात्मे के बाद से इस क्षेत्र के संवैधानिक दर्जे को लेकर चल रहे तनाव को उजागर करता है। इस रेजोल्यूशन का हस्र यूनियन टेरिटरी में राजनीतिक बहाली की गति और दायरे को लेकर गहरे मतभेदों को दर्शाता है।

द इंडियन एक्सप्रेस ने बुधवार को एक आर्टिकल प्रकाशित किया जिसमें उन राजनीतिक ताकतों की समीक्षा की गई जिन्होंने कथित तौर पर जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला द्वारा स्टेटहुड की बहाली की मांग को लेकर पेश किए गए रेजोल्यूशन को रोकने की कोशिश की (Indian Express)। "Rooted in J&K, backing New Delhi: Who wanted CM Omar's statehood resolution disallowed" शीर्षक वाले इस लेख में इस वाकये को क्षेत्र में जड़े जमाए राजनीतिक खिलाड़ियों और नई दिल्ली में केंद्रीय सरकार के बीच एक मुकाबले के रूप में पेश किया गया है।

विधानसभा में पेश किए गए इस रेजोल्यूशन में अगस्त 2019 में किए गए संवैधानिक बदलावों को पलटने की मांग की गई है, जब केंद्र ने आर्टिकल 370 को रद्द कर दिया था और तत्कालीन राज्य को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के रूप में दो यूनियन टेरिटरी में बांट दिया था। उस पुनर्गठन के बाद से ही स्टेटहुड की बहाली अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस सहित मुख्यधारा की क्षेत्रीय पार्टियों की मुख्य मांग बनी हुई है, जो पिछले साल के अंत में हुए विधानसभा चुनावों के बाद सत्ता में लौटी है।

रिपोर्ट के अनुसार, रेजोल्यूशन को खारिज कराने की कोशिश यूनियन टेरिटरी में राजनीतिक बहाली की रफ्तार और दायरे को लेकर लगातार बने तनाव को उजागर करती है। जहाँ श्रीनगर में चुनी हुई सरकार ने इस मांग को जनादेश का प्रतिबिंब बताया है, वहीं इस प्रस्ताव के खिलाफ सामने आई कथित oposición इस बात का संकेत देती है कि इस क्षेत्र के संवैधानिक दर्जे पर फैसले लेने का अधिकार अभी भी पूरी तरह से नई दिल्ली के पास है। यह आर्टिकल उन लोगों के बीच की लकीरों को टटोलता है जिन्हें "जम्मू-कश्मीर में जड़ें जमाए हुए" और "नई दिल्ली का समर्थन करने वाले" बताया गया है, और यह सुझाव देता है कि रेजोल्यूशन का हस्र स्वायत्तता और केंद्रीय नियंत्रण को लेकर चल रहे बड़े संघर्ष का एक जरिया बन गया है।

यह घटनाक्रम केंद्र के नेतृत्व में चल रही एक क्रमिक सामान्यीकरण प्रक्रिया की पृष्ठभूमि में सामने आया है, जिसमें विधानसभा चुनाव कराना और सीमित विधायी कामकाज की बहाली शामिल है, हालांकि अभी तक पूर्ण स्टेटहुड नहीं दिया गया है। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री पहले ही यह संकेत दे चुके हैं कि "उचित समय" पर स्टेटहुड बहाल कर दिया जाएगा, लेकिन इसके लिए कोई समयसीमा तय नहीं की गई है। रेजोल्यूशन को रोकने की कथित कोशिश क्षेत्रीय नेतृत्व के विधायी एजेंडे और इस क्षेत्र के संवैधानिक दर्जे पर जमीन छोड़ने की केंद्र की इच्छा के बीच के फासले को रेखांकित करती है। यह अभी स्पष्ट नहीं है कि इस रेजोल्यूशन को दोबारा लाया जाएगा या मुख्यमंत्री के पास इस मांग को आगे बढ़ाने के लिए कौन से प्रक्रियात्मक रास्ते बचे हैं।

उल्लिखित स्रोत

Indian Express