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Raqs मीडिया कलेक्टिव के अलग-अलग जगहों पर फैले आर्टिस्टिक सफर की पड़ताल

The Indian Express की एक प्रोफाइल में ज्यूरिख, जंतर-मंतर और लद्दाख में राक़्स के ‘डिसोबीडिएंट शामियाना’ का जायजा लिया गया है।

The Indian Express की आज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, Raqs’ Disobedient Shamiana नाम के एक ट्रैवलिंग आर्ट इंस्टॉलेशन ने ज्यूरिख, दिल्ली के जंतर-मंतर और लद्दाख — इन तीन अलग-अलग इलाकों की अपनी अनोखी यात्रा से लोगों का ध्यान खींचा है। इस प्रोजेक्ट का नाम इसके प्रतीकात्मक विद्रोह को दर्शाता है। इसमें एक शामियाने (पारंपरिक भारतीय तंबू जिसका इस्तेमाल अक्सर शादियों और पब्लिक इवेंट्स में होता है) को एक मोबाइल आर्टिस्टिक स्टेटमेंट के रूप में पेश किया गया है।

आर्टिकल में बताए गए इस इंस्टॉलेशन के रूट से पता चलता है कि अलग-अलग जगहों को आपस में जोड़ने के लिए सोच-समझकर चुनाव किए गए हैं। ये जगहें हैं: ज्यूरिख जो इंटरनेशनल आर्ट और डिप्लोमेसी का गढ़ है; दिल्ली का जंतर-मंतर जो एक ऐतिहासिक वेधशाला (ऑब्जर्वेटरी) होने के साथ-साथ राजनीतिक प्रदर्शनों का भी केंद्र रहा है; और लद्दाख जो अपनी जियोपॉलिटिकल संवेदनशीलता और सांस्कृतिक विशिष्टता के लिए जाना जाता है। हालांकि आर्टिकल में इस प्रोजेक्ट को बनाने वालों या इसके ऑर्गेनाइजर्स के नाम नहीं बताए गए हैं, लेकिन यह शामियाने की ‘अवलगता’ या ‘डिसोबिडिएंस’ को एक मुख्य थीम के तौर पर उभारता है, जो सख्त सांस्कृतिक या राजनीतिक नियमों की आलोचना की तरफ इशारा करता है।

खबर के मुताबिक, जंतर-मंतर पर इस इंस्टॉलेशन ने स्थानीय एक्टिविस्ट्स और आर्टिस्ट्स के साथ संवाद किया, हालांकि इन मुलाकातों की डिटेल्स नहीं दी गई हैं। लद्दाख में इसका पहुंचना क्षेत्रीय पहचान और पर्यावरण संरक्षण पर चल रही बातचीत के दौर में हुआ, हालांकि आर्टिकल इस आर्टवर्क को सीधे तौर पर इन मुद्दों से नहीं जोड़ता है। ज्यूरिख को शुरुआती पॉइंट के तौर पर चुनना इस बात का संकेत देता है कि प्रोजेक्ट को आर्ट और विरोध से जुड़ी ग्लोबल बहसों का हिस्सा बनाने की कोशिश की गई है, हालांकि वहां इसे किस तरह का रिस्पॉन्स मिला, इसका जिक्र नहीं किया गया है।

‘शामियाना’ शब्द का साउथ एशिया में अपना ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है, और यह अक्सर मेल-जोल वाले उत्सवों से जुड़ा होता है। इसे ‘डिसोबीडिएंट’ कहकर, यह प्रोजेक्ट इस परंपरा को चुनौती देता नजर आता है, और मेल-मिलाप के प्रतीक को सवाल उठाने या विरोध के प्रतीक में बदल देता है। हालांकि, आर्टिकल में आर्टिस्ट्स, क्यूरेटर्स या इसमें हिस्सा लेने वाले लोगों के डायरेक्ट कोट्स नहीं दिए गए हैं, जिससे इस काम का मकसद और उसका असर लोगों की अपनी समझ पर छोड़ दिया गया है।

यह बात अभी साफ नहीं है कि यह इंस्टॉलेशन इन जगहों तक फिजिकली कैसे पहुंचा या यह अपनी यात्रा आगे भी जारी रखेगा या नहीं। आर्टिकल में इसके फंडिंग सोर्सेज, टाइमलाइन या इसके डिस्प्ले से जुड़े खास इवेंट्स के बारे में भी कोई जानकारी नहीं दी गई है। आज की तारीख में, शुरुआती रिपोर्ट के अलावा इस प्रोजेक्ट के फ्यूचर प्लान्स या इसके रिस्पॉन्स को लेकर कोई संकेत नहीं मिला है।

उल्लिखित स्रोत

Indian Express