नीति आयोग ने भारत को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करने पर रिपोर्ट जारी की

कल, नीति आयोग ने “की सेक्टर्स टू पोजीशन इंडिया एज ए ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब” (Key Sectors to Position India as a Global Manufacturing Hub) शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें वैश्विक स्तर पर घरेलू उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए उन्हें मजबूत करने पर सरकार के फोकस को रेखांकित किया गया है (PIB)। भारत के मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को बढ़ावा देने के चल रहे प्रयासों के तहत जारी इस दस्तावेज में उन महत्वपूर्ण क्षेत्रों की पहचान की गई है जो ग्रोथ को गति दे सकते हैं और निवेश आकर्षित कर सकते हैं, हालांकि शुरुआती सारांशों में सुझाई गई रणनीतियों या उद्योगों के बारे में विशिष्ट विवरण का खुलासा नहीं किया गया था (Google News India)।
यह रिपोर्ट “मेक इन इंडिया” जैसी व्यापक नीतिगत पहलों के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य 2025 तक जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के योगदान को मौजूदा 17% से बढ़ाकर 25% करना है। सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग ने इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए पहले भी इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड, स्किल डेवलपमेंट और रेगुलेटरी सुधारों की जरूरत पर जोर दिया है। हालांकि नवीनतम रिपोर्ट में विस्तृत आंकड़े उपलब्ध नहीं कराए गए हैं, लेकिन इसके जारी होने से यह संकेत मिलता है कि मैन्युफैक्चरिंग को आर्थिक मजबूती के एक स्तंभ के रूप में संस्थागत समर्थन मिलना जारी रहेगा, खासकर ग्लोबल सप्लाई चेन में व्यवधानों और बदलती ट्रेड गतिशीलता के मद्देनजर (PIB)।
इंडस्ट्री एनालिस्ट्स का कहना है कि भारत की मैन्युफैक्चरिंग महत्वाकांक्षाओं के सामने ऊर्जा सुरक्षा, लॉजिस्टिक्स की अड़चनें और चीन तथा वियतनाम जैसे स्थापित हब से मिलने वाली टक्कर जैसी चुनौतियां हैं। उम्मीद है कि नीति आयोग का यह दस्तावेज लक्षित सिफारिशों के जरिए इन मुद्दों का समाधान करेगा, हालांकि पूरी डिटेल संभवतः स्टेकहोल्डर्स द्वारा टेक्स्ट की समीक्षा करने के बाद ही सामने आएगी। रिपोर्ट में “प्रमुख क्षेत्रों” (की सेक्टर्स) पर दिए गए जोर से एक सेक्टर-विशेष दृष्टिकोण का संकेत मिलता है, जिसके तहत संभवतः इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स या रिन्यूएबल एनर्जी जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जा सकती है, जिन्हें हाल ही में नीतिगत प्रोत्साहन मिले हैं (Google News India)।
फिलहाल, सरकार ने रिपोर्ट के सुझावों को लागू करने की कोई समयसीमा घोषित नहीं की है और न ही इसके लिए कोई विशेष फंड आवंटित किया है। इस रोडमैप को कार्ययोजना में बदलने के लिए मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री द्वारा राज्यों और प्राइवेट एंटिटीज के साथ समन्वय करने की उम्मीद है। चूंकि भारत का मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट वर्तमान में ग्लोबल प्रोडक्शन का लगभग 4% है — जो चीन के 30% से काफी कम है — इसलिए इस रिपोर्ट की सफलता इसके एग्जिक्यूशन और निरंतर पूंजी प्रवाह को आकर्षित करने पर निर्भर करेगी।
जो बात अभी भी स्पष्ट नहीं है, वह यह है कि औद्योगिक इंफ्रास्ट्रक्चर में क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने या ट्रेड को प्रभावित करने वाले भू-राजनीतिक तनावों से निपटने के लिए सिफारिशों को कैसे तैयार किया जाएगा। आने वाले हफ्तों में जब पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो जाएगी, तो इस बारे में और अधिक स्पष्टता मिलने की उम्मीद है।


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